आज से ठीक एक साल पहले उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में ऋषिगंगा व धौलीगंगा नदियों में अचानक आये अप्रत्याशित सैलाब से जहाँ एक ओर 204 लोग काल के गाल में समा गये थे, वही दूसरी ओर रिणी गाँव के पास स्थित 13.2 मेगावाट क्षमता की लघु जलविद्युत परियोजना पूरी तरह नष्ट हो गयी थी तो 520 मेगावाट क्षमता की निर्माणाधीन तपोवन-विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना का बाँध व उससे जुडी सुरंगे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी थी।
विशिष्ट लक्षण
फिर इस आपदा में कुछ विशिष्टतायें भी थी जिसके कारण इसने, वैज्ञानिक हो या समाचार माध्यम या फिर आम आदमी, सभी का ध्यान अपनी और खींचा।
(i) सामान्यतः आने वाली बाढ़ के विपरीत यह घटना जलागम क्षेत्र में हुयी भारी वर्षा से सम्बन्धित नहीं थी। सच तो यह है कि घटना के आगे-पीछे क्षेत्र में वर्षा हुयी ही नहीं थी।
(ii) साथ ही यह बाढ़ जलागम क्षेत्र में अवस्थित हिमनदीय झील (glacial lake) या भू-स्खलन के कारण अस्तित्व में आयी झील (landslide lake) के टूटने से सम्बन्धित नहीं थी। सच कहे तो जलागम क्षेत्र में ऐसी कोई झील थी ही नहीं।
(iii) यह बाढ़ किसी जलाशय या बाँध से अचानक भारी मात्रा में छोड़े गये पानी से भी सम्बन्धित नहीं थी।
(iv) फिर यह बाढ़ शीत ऋतु में घटित हुयी थी जब हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों का जल स्तर अपने न्यूनतम स्तर पर होता है।
(v) इस घटना के कारण क्षेत्र की मुख्य नदी, ऋषिगंगा का प्रवाह बाधित हो गया था और रौंथी गधेरे से संगम से कुछ पहले एक झील अस्तित्व में आ गयी थी।
(vi) जलप्रवाह में घटना के द्वारा लाये गये मलबे से बनी झील के कारण 700 वर्ग किलोमीटर से कही अधिक जलागम क्षेत्र वाली ऋषिगंगा ने इस बाढ़ में कोई भी योगदान नहीं किया।
(vii) इस बाढ़ के लिये केवल 83 वर्ग किलोमीटर जलागम क्षेत्र वाला एक छोटा गधेरा (रौंथी गधेरा) ही पूर्णतः उत्तरदायी था।
(viii) इस घटना के कारण 7 फरवरी 2021 को मारवाड़ी में अलकनंदा में 01 घंटे की अवधि में 60 लाख घन मीटर पानी प्रवाहित हुवा जो कि अकेले मात्र 83 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले रौंथी गधेरे के जलागम में उत्पन्न हुवा था, और इसके कारण उस दिन सुबह 11 बजे अलकनंदा का जल प्रवाह 41 से बढ़ कर 1670 क्यूमेक (cumecs) हो गया था। साथ ही उस दिन अलकनंदा ने 28 जून 2013 का उच्चतम बाढ़ स्तर (1385.54 मीटर) भी पार कर लिया था। मात्र 83 वर्ग किलोमीटर के भू-भाग में इतनी भारी मात्रा में पानी की अचानक उत्पत्ति किसी आश्चर्य से कम नहीं है।
विशेषज्ञों की संलिप्तता
इस घटना के कारण तपोबन में बाँध की सुरंग में फॅसे व्यक्तियों को खोजने के लिये लम्बी अवधि तक बचाव अभियान चलाया गया। फिर जाड़े के मौसम में आयी इस बाढ़ ने देश के अनेको प्रतिष्ठित संस्थानों का ध्यान भी अपनी ओर खींच ही लिया था। सो इन सब वैज्ञानिको की संलिप्तता तथा इन विशेषज्ञों के क्षेत्र भ्रमण के कारण यह घटना काफी समय तक समाचार पत्रों की सुर्खियों में रहीं थी।
उपग्रहीय सुदूर संवेदन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के चलते इस घटना से जुड़े क्षेत्र के उपग्रहीय चित्र घटना के दिन से ही उपलब्ध हो गये थे जिनके आधार पर विभिन्न वैज्ञानिको, शोध व तकनीकी संस्थानों के द्वारा घटना के कारणों की गहन विवेचना के साथ ही ऋषिगंगा में बनी झील के टूटने से सम्भावित क्षति का प्रतिरूपण भी किया गया था।
इस घटना को इस क्षेत्र में घटित अब तक की सबसे बड़ी या विनाशकारी आपदा तो निश्चित ही नहीं कहा जा सकता है, पर सच मानिये यह इस क्षेत्र में घटित अकेली आपदा है जिसे लेकर राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में इतने शोध पत्र प्रकाशित हुवे है – शायद घटना के कारणों से जुड़ी अनिश्चितता तथा उपग्रहीय चित्रों की सहज उपलब्धता इसके लिये उत्तरदायी हो।
जब उत्तराखण्ड या देश ही नहीं अपितु पूरे विश्व के वैज्ञानिक संस्थान इस घटना के अध्ययन व विश्लेषण में जुटे हो तो फिर हमारी सरकारे कैसे पीछे रह सकती थी – सो पहले राज्य सरकार तो उसके बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण के द्वारा इस घटना के कारणों की जाँच-पड़ताल व भविष्य में पुनरावृत्ति को रोकने हेतु सुझाव देने के लिये उच्च स्तरीय समितियों का गठन किया गया और वर्तमान में इन सभी की संस्तुतिया सहज ही उपलब्ध है।
ऋषिगंगा में बनी झील
और चाहे जो हुवा हो; पर इस घटना में प्रकृति ने विनाश के साथ-साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता का भी परिचय दिया और रौंथी गधेरा व ऋषिगंगा के संगम से कुछ ही दूरी पर ऋषिगंगा का प्रवाह बाधित होने से एक झील अस्तित्व में आ गयी।
इस घटना के बाद वैज्ञानिको के साथ-साथ प्रशासन का ध्यान भी लम्बे समय तक ऋषिगंगा पर बनी इस झील पर ही केन्द्रित रहा, और ज्यादातर का मानना था कि बरसात में जल स्तर में वृद्धि होने के साथ बढ़ने वाले पानी के दबाव के कारण झील से अचानक भारी मात्रा में पानी के रिसाव होने की सम्भावना बढ़ जायेगी, और इन स्थितियों में नीचे के क्षेत्र में एक बार फिर से तबाही आ सकती है।
ऐसे में ज्यादातर विशेषज्ञों का परामर्श था कि मानवीय हस्तक्षेप से इस झील को परिदृश्य से हटा देना ही सर्वोत्तम होगा। इसके लिये कुछ को तो हिमालय के इस अतिसंवेदनशील क्षेत्र में विस्फोटकों के उपयोग से भी कोई समस्या नहीं थी।
वैज्ञानिको के आंकलन का जो भी रहा हो, पर पूरा का पूरा बारिश का मौसम बीत जाने के बाद भी प्रकृति द्वारा बनायीं गयी इस झील को कोई क्षति नहीं हुयी।
बाढ़ चेतावनी तंत्र
बाँध के अलावा दूसरा पक्ष जिस पर ज्यादातर विशेषज्ञ एकमत थे क्षेत्र में बाढ़ चेतावनी तंत्र से जुड़ा था।
इस घटना में हताहत हुवे व्यक्तियों में से अधिकांश नदी तल में बन रहे बाँध में काम कर रहे मजदूर व अन्य कार्मिक थे। अब पानी का प्रवाह कितना भी तेज क्यों न हो, यदि रिणी में लघु जलविद्युत परियोजना को हुयी क्षति के समय भी चेतावनी प्रसारित कर दी जाती तो निश्चित ही तपोवन-विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना के निर्माणाधीन बाँध स्थल पर काम कर रहे व्यक्तियो में से अधिकांश को बचाया जा सकता था।
परोक्ष रूप से ही सही पर राज्य सरकार ने भी इस घटना के बाद चेतावनी व्यवस्था की आवश्यकता को स्वीकारा तो था ही, और इसीलिये ऋषिगंगा में अस्तित्व में आयी झील से सम्भावित खतरे के दृष्टिगत उसने आनन-फानन में चेतावनी देने के लिये उस समय कुछ फौरी व्यवस्था कर भी दी थी।
वर्तमान परिदृश्य
वैसे अगर आज एक साल के बाद पुनर्विचार करे तो आपदा के उपरान्त विभिन्न संस्थानों के द्वारा तैयार की गयी रिपोर्टो व वैज्ञानिको द्वारा लिखे व प्रकाशित किये गये शोध पत्रों के अलवा इस आपदा प्रभावित क्षेत्र में कुछ भी नहीं बदला है।
नन्दा देवी की पहाड़ियाँ एक बार फिर से बर्फ से लकदक है।
तबाही मचाने वाले रौंथी गधेरे में पहले भी ज्यादा पानी नहीं होता था, और आज भी नहीं है।
ऋषिगंगा पर आपदा के कारण बनी झील से रिस रहे पानी ने अपने लिये अच्छा-खासा रास्ता बना लिया है, और एक बार फिर से ऋषिगंगा का प्रवाह पहले की ही तरह हो गया है।
जाड़ो में हिम-गलाव न होने के कारण जैसा यहाँ ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों के साथ होता है, ऋषिगंगा व धौलीगंगा दोनों का ही प्रवाह आज अपने न्यूनतम स्तर पर है।
स्वयं सेवी संस्थाये भी क्षेत्र से विदा ले ही चुकी है और वैज्ञानिक संस्थाओ व विशेषज्ञों का कर्तव्य भी परामर्श देने के साथ पूरा हो गया है।
प्रशासन अब तक प्रभावितो को अनुमन्य राहत दे ही चुका है।
पास-पड़ोस के गावों में भी जन-जीवन सामान्य हो चला है। फिर आपदाओं को तो यहाँ के लोगो ने अपनी नियति मान ही रखा है, और उन्हें पता भी कहाँ है कि क्या होना चाहिये; सो वो सब भी संतुष्ट है।
इस आपदा को ले कर अनेको वेबिनार, गोष्ठियाँ व प्रशिक्षण अब तक हो ही चुके है, और वर्षगांठ पर शायद इनकी भी इतिश्री हो ही जाये।
अब इतना जरूर है कि बाढ़ के कारण बाँध व सुरंगो में जमा मलबा जरूर हटा दिया गया है।
ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि क्या धौलीगंगा की यह बाढ़ इस क्षेत्र में घटित बस एक और आपदा थी, और क्या इससे परिदृश्य में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा ?
आगे की रणनीति
ऐसे में आगे की सारी की सारी जिम्मेदारी हमारे आपदा प्रबन्धको की है जिन्हे क्षेत्र में घटित यह व अन्य आपदाओं से सबक लेते हुवे क्षेत्र को आपदाओं से सुरक्षित बनाने के साथ ही आपदा प्रभावितो को अधिक प्रभावी राहत देने के लिये एक दूरगामी व प्रभावी रणनीति बनानी होगी।
इस परिप्रेक्ष्य में अभी हाल Journal of Disaster and Emergency Research में प्रकाशित एक शोध पत्र में दिये गये सुझावों में से कुछ पर तो काम किया ही जा सकता है।
जोखिम आंकलन
क्षेत्र में पूर्व में घटित आपदाओं के विस्तृत विवरण के आधार पर किये गये जोखिम आंकलन को आपदा प्रवत्त हिमालयी क्षेत्र में बड़ी परियोजनाओं की स्थापना हेतु दी जाने वाली अनुमति का अनिवार्य अंग बनाया जाना चाहिये।
सूचनाओं का अबाधित आदान – प्रदान
जोखिम आंकलन सम्बन्धित आंकड़ों व आख्याओ को सार्वजनिक किया जाना चाहिये ताकि असुरक्षित व पर्यावरण अनुकूल न होने पर सम्बन्धित परियोजना को जहाँ एक ओर आम जनता के विरोध का सामना करना पड़े, तो वही दूसरी ओर ऐसी परियोजना को वित्त पोषण एवं जोखिम हस्तान्तरण हेतु उपयुक्त सांझीदार न मिल सके।
इससे और कुछ हो या न हो इतना तो सुनिश्चित अवश्य ही होगा कि इस संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षित व पर्यावरण अनुकूल परियोजनाये ही स्थापित होंगी।
चेतावनी तंत्र
क्षेत्र में वर्षा के परिमाण पर आधारित बाढ़ व भू-स्खलन चेतावनी तंत्र की व्यवस्था की जानी चाहिये तथा साथ ही महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं व आबादी के समीप स्थित संवेदनशील भू-स्खलन क्षेत्रों के लिये निगरानी व चेतावनी तंत्र की स्थापना की जानी चाहिये।
चेतावनी का प्रचार-प्रसार
चेतावनी को समय रहते विभिन्न माध्यमों से जन-सामान्य के मध्य प्रसारित किये जाने के साथ ही लोगो को चेतावनी के भिन्न-भिन्न स्तरों को स्थानीय परिप्रेक्ष्य में समझने, एवं चेतावनी मिलने के उपरान्त की जाने वाली प्रतिक्रिया से परिचित होने के लिये नियमित रूप से जागरूकता व प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिये।
परियोजनाओं का उत्तरदायित्व
क्षेत्र में स्थापित परियोजनाओं के लिये आपदा पूर्व तैयारी, न्यूनीकरण व रोकथाम उपायों में सहयोग व भागीदारी अनिवार्य की जानी चाहिये।
मानव संसाधन में निवेश
पता नहीं क्यों पर हमें संस्थाओ व विभागों की स्थापना में तो कोई भी संकोच नहीं होता है, पर जब बात इन सब के संचालन के लिये मानव संसाधन उपलब्ध करवाने की आती है तो हमारे पैर ठिठकने लगते है और ऐसा ही कुछ आपदा प्रबन्धन के साथ भी हो रहा है।
शायद आज तक हम आपदा प्रबन्धन को विशेषज्ञों के द्वारा किया जाने वाला काम मान ही नहीं पाये है।
बढ़ रही आपदाओं के दृष्टिगत इस प्रवृत्ति से मुक्त होने तथा आपदा प्रबन्धन सम्बन्धित मानव संसाधन पर निवेश किया जाना अत्यन्त आवश्यक है।
राहत के मोहपाश से मुक्ति
दो दशक से ज्यादा हो गये हमें आपदा उपरान्त राहत से आपदा पूर्व तैयारी व न्यूनीकरण की ओर बढ़ते, और इस अवधि में एक अधिनियम तथा राष्ट्र से ले कर जनपद स्तर तक अनेको आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण अस्तित्व में आ भी गये है, पर कुछ नहीं बदला तो हमारा आपदा राहत का मोह।
आप माने या न माने पर आपदा राहत आपदा प्रबन्धन चक्र का एक ऐसा भाग है जिस पर हर किसी की नजर होती है और समाचार माध्यमों के लिये तो यही समय होता है अपनी टी. आर. पी. सुधारने का। इस समय जो भी सामने हो वही हिट व हीरो होता है और शायद इसीलिये आपदा पूर्व तैयारी, न्यूनीकरण व रोकथाम जैसे महत्वपूर्ण पक्षों को प्रायः अनदेखी का सामना करना पड़ता है।
अतः आवश्यक है कि आपदा पूर्व तैयारी, न्यूनीकरण व रोकथाम को वंचित महत्व व वरीयता दी जाये।
अन्त में
समय रहते यदि हमने आपदा सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया तो क्षेत्र में निरन्तरता में घटित होने वाली आपदाओं व उनसे होने वाली नियमित क्षति का क्षेत्र में होने वाले पूंजीगत निवेश पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ना निश्चित है और इसका सीधा असर क्षेत्र के विकास व यहाँ के लोगो के जीवन कि गुणवत्ता पर पड़ेगा।
अतः आवश्यक है कि आपदा सुरक्षा के लिये समुचित दूरगामी उपाय किये जाये।
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